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किसान आंदोलन से आई तस्वीर हिंदी साइन बोर्ड पर कालिख पोतते हुए किसान जानिए क्या है सच

पिछले काफी दिनों से किसान दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं किसान संगठन 48 दिनों से लगातार केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों का विरोध प्रदर्शन करते हुए दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं इसी दौरान हाल ही में सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें यह दिखाया जा रहा है कि रिलायंस जिओ टावर उखाड़ने के बाद अब किसान हिंदी का बॉयकॉट कर रहे  हैं



हाल ही में फेसबुक पर एक यूजर ने इन तस्वीरों को शेयर करते हुए लिखा है कि रिलायंस जिओ टावर उखाड़ने के बाद अब किसान हिंदी को बदनाम करने पर तुले हुए हैं यह कैसे किसान हुए ये समाधान नहीं व्यवधान चाहते हैं..ये शांति नहीं संघर्ष चाहते है...ये विकास नहीं, विनाश चाहते हैं, ये स्वतंत्रता नहीं, स्वछंदता चाहते हैं, ये सड़क नहीं, स्पीड ब्रेकर चाहते हैं। #फर्जी_किसान_आन्दोलन"

यह तस्वीर फेसबुक यूजर कृष्ण कांत वर्मा की फेसबुक वालों से लिया गया है जिसका लिंक हमने यहां पर दिया है आप इस लिंक पर क्लिक करके उनकी ऑफिशियल पोस्ट पढ़ सकते हैं आपको बता दें कि किसान पिछले काफी दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं तथा केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को किसानों के विरुद्ध बताते हुए उनका विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं हालांकि इस किसान आंदोलन के दौरान हमारे देश की मुख्यधारा के मीडिया ने किसानों को कहीं तरह से बदनाम करने साजिश की थी लेकिन इस संगठित किसान आंदोलन के आगे मीडिया भी फेल होता नजर आया।


क्या था पूरा मामला?

हमने जब इस पोस्ट की जांच पड़ताल की तो पाया कि जिस तस्वीर में इन तथाकथित किसानों को हिंदी भाषी साइन बोर्ड पर कालिख पहुंचते हुए दर्शाया गया है वह किसान आंदोलन से संबंधित नहीं है उनका संबंध क्षण भारत से है यह वीडियो यूट्यूब पर 14 सितंबर 2020 को अपलोड भी हुआ था


इसे किस तरह किसान आंदोलन से जोड़ा जा रहा है?

सोशल मीडिया पर हिंदी साइन  भाषी बोर्ड पर कालिख पोतते हुए जिन लोगों को दिखाया जा रहा है उन लोगों को किसान आंदोलन से जोड़ने की मुहिम चल पड़ी है ट्विटर पर श्रीष त्रिपाठी नाम के एक यूजर ने ट्वीट करते हुए कहा कि किसान आंदोलन से जुड़े हुए लोगों का असली चेहरा सामने आ रहा है टॉवर तोड़ने के बाद अब पंजाब में हिंदी नही चलेगी. किसान आन्दोलन बहाना है हिन्दू और हिन्दू विरोध असली मकसद है. ये ही है, किसान आंदोलन की हकीकत? ये खालिस्तानी आंदोलन है, किसानों के भेष में आतंकी, उनके समर्थक है. उनका एजेंडा,अराजकता फैलाना देश को तोड़ना है. ये लोग पंजाबियों के दुश्मन हैं, इन्हें पूरे भारत मे रह रहे पंजाबियों के बारे में चिंता होती तो ऐसा कभी नहीं करते. दोगले बामपंथियों का असर है. यही खालिस्तानियों ने किया था कभी?"



क्या है सच ?

हमने जब इस खबर की जांच पड़ताल करने के लिए सोशल मीडिया को खंगाला तो हमें कुछ और ही मिला क्योंकि जिन तस्वीरों को किसान आंदोलन से जोड़कर पेश किया जा रहा है वह किसान आंदोलन से जुड़ी हुई नहीं है क्योंकि यह  फोटो और वीडियो 2017 के पंजाब में हुए हिंदी आंदोलन की है। इस प्रदर्शन के बाद पंजाब सरकार ने पंजाबी भाषा में डेस्टिनेशन को सबसे ऊपर लिखना शुरू किया था.


25 अक्टूबर 2017 को हिंदुस्तान टाइम्स की खबर में भी इस हिंदी विरोधी आंदोलन को कवर किया गया था। जिसमें बताया गया था किपंजाब में कुछ संगठनों द्वारा हिंदी और अंग्रेजी के नीचे साइनबोर्ड पर नंबर तीन पर पंजाबी लिखने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया गया था।


इस तरह हमने अपनी जांच पड़ताल में पाया कि सोशल मीडिया पर वायरल की जा रही हिंदी भाषी बोर्डों पर कालिख पोतते हुए किसानों की वायरल तस्वीर झूठी साबित हुई


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